तीसरा अध्याय

अष्टावक्र जनक की परीक्षा लेते हुए पूछते और समझाते हैं  :

जीवन के सार अपनी अविनाशी

आत्मा को जान लेने पर भी तुझ
आत्म ज्ञानी धीर पुरुष की अभी
धन कमाने में इतनी रूचि कैसे है !! ३। १

जैसे सीप को न जानने से

वह लोभ के कारण चांदी लगती है
वैसे ही आत्मा (अपने आप) को
न जानने के कारण गल्ती से संसारिक
विषय वस्तुएं अच्छी लगती हैं !! ३। २

जिसमें यह संसार सागर में लहरों

की तरह बनता बिगड़ता रहता है
वह मैं ही हूँ ! यह जानकर भी तुम
क्यों बेचारों की तरह भाग रहे हो !! ३। ३

अति सुंदर शुद्ध चैतन्य बोध रूप

अपनी आत्मा के बारे में सुनकर भी
आसपास की विषय वस्तुओं में
ईच्छा रखने वाला दीनता मूढ़ता
को ही प्राप्त होता है !! ३। ४

हैरानी की बात है की

सभी प्राणियों में आत्मा को और
आत्मा में सभी प्राणियों को
जान लेने वाले मुनि होकर भी
तुम मेरा - तेरा जैसी बातें और
व्यवहार कर रहे हो !! ३। ५

मैं हैरान हूँ की तुम

अद्वैत में स्थित होकर और
मोक्ष के लिए तैयार होने पर भी
इच्छाओं और सुख के जाल में
फसकर परेशान हो रहे हो ॥ ३। ६

आश्चर्य है की ज्ञान के दुश्मन इच्छा

के पीछे भागकर कमजोर होकर
भी अपने अंत समय तक तुम
इच्छा ही करते हो ॥ ३। ७

हैरानी है की बात है की

जो इस संसार से थक ऊब गया है
जो सच और झूठ को समझता है
जो सचमुच मुक्ति चाहता है
उसे अब मुक्ति से भी डर लग रहा है ॥ ३ । ८

धैर्यवान व्यक्ति भी संसार के

सुख और दुःख को भोगता और सहता है ।
लेकिन वह अपने आप को
अपनी आत्मा को देखते हुए
न तो इनसे उतेजित होता है
न ही इनसे परेशान होता है ॥ ३ । ९

जो व्यक्ति कोशिशों में लगे

अपने शरीर को भी
दूसरे जैसा ही देखता समझता है
वह बड़े दिलवाला
प्रशंसा या निंदा में भी
कैसे विचलित हो सकता है ॥ ३ । १०

जिसकी इस संसार को माया सपने

की तरह देखते हुए सारी उत्सुकताएँ
खत्म हो गई हों वह धीरज वाला व्यक्ति
मृत्यु के करीब आने पर
कैसे डर सकता है ॥ ३ । ११

जिस महात्मा का मन

मुक्ति में भी इच्छुक नहीं है
उस आत्म ज्ञान से तृप्त व्यक्ति
की तुलना किस से की जा सकती है ॥ ३ । १२

जो स्वभाव से अनुभव से

यह जान लेता है की यहाँ
दिखाई दे रही हर चीज़
असल में हमेशा नहीं है ।
वह धीर बुद्धि वाला फिर कैसे
देख सकता है की यहाँ
क्या पकड़ने लायक है और
क्या छोड़ने लायक है ॥ ३ । १३

जिसकी अंदर की मैल निकल गई

जिसकी दुविधाएँ मिट गईं
जो किसी पर आश्रित नहीं
उसके लिए जीवन में आईं
भोग की विषय वस्तुएँ
न सुख के लिए हैं और
न ही दुःख के लिए हैं ॥ ३ । १४


॥ तीसरा अध्याय समाप्त ॥ 



































दूसरा अध्याय


ऋषि अष्टावक्र की बात सुनकर राजा जनक कहने लगे  :

हैरानी की बात है की 
मैं निर्दोष हूँ , शांत हूँ, बोध हूँ
और प्रकृति से भी परे हूँ !
इतनी देर से मैं केवल मोह ममता 
में ही ठगा गया हूँ !! २। १ 

जैसे मैं अपने शरीर को प्रकाशित करता हूँ 
वैसे ही यह संसार मुझसे ही प्रकाशित होता है !
इसलिए सारा संसार मेरा है या 
कुछ भी मेरा नहीं !! २।  २ 

आश्चर्य है की इस शरीर सहित संसार को 
अपने से अलग जानकर अभी ही कैसे मुझे
परमात्मा दिखाई दे रहे हैं !! २। ३ 

जैसे लहरें झाग बुलबुले 
पानी से अलग नहीं हैं !
वैसे ही आत्मा से उत्पन यह संसार 
आत्मा से अलग नहीं है !! २।  ४ 

जैसे गहराई से देखने पर हर कपड़ा 
केवल धागों का जोड़ ही नज़र आता है 
वैसे ही गहराई से देखने पर यह संसार 
आत्मा का फैलाव ही नज़र आता है !! २। ५ 

जैसे गन्ने में महसूस होने वाली मिठास
उसमें समाए रस के कारण होती है !
वैसे ही मुझ में महसूस होने वाला संसार 
मेरे ही कारण अस्तित्व में है !! २। ६ 

जैसे अँधेरे में रस्सी साँप लगती है 
पर रौशनी में नहीं !
वैसे ही आत्मा को न जानने तक 
संसार सच लगता है 
पर आत्म ज्ञान होने पर नहीं !! २। ७ 

प्रकाश मेरा ही रूप है 
मैं उससे अलग नहीं हूँ !
जब संसार प्रकाशित होता है
तो मेरे ही प्रकाश से होता है !! २।  ८ 

हैरानी की बात है की 
यह संसार मेरे अज्ञान की ही कल्पना है !
जैसे सीपी में चांदी, रस्सी में साँप और 
रेत में पानी जैसे दिखने वाली सूर्य किरणें !! २। ९

मुझसे निकलने वाला यह संसार

मुझमें ही लीन हो जाता है !
जैसे मिटी का घड़ा मिटी में
पानी की लहरें पानी में और
सोने के गहने सोने में मिल जाते हैं !! २। १०

मैं हैरान हूँ

मेरे भीतर स्थित अविनाशी को नमस्कार है !
जो संसार में पत्ते से ब्रह्म तक नाश होने पर भी
मुझ में बैठा रहता है !! २।  ११

मैं हैरान हूँ मुझको नमस्कार है

मैं एक शरीर वाला होकर भी
न कहीं जाता हूँ न कहीं आता हूँ
और सारा संसार मुझ में फैला हुआ है !! २। १२

मैं हैरान हूँ मुझे नमस्कार है

मेरे जैसा कुशल कोई नहीं
जो शरीर और संसार को बिना छुए
कब से इन्हें धारण किये हूँ !! २  १३

मैं हैरान हूँ  मुझमें स्थित उसको नमस्कार है

जिसमें मेरा कुछ भी नहीं है या वो सब कुछ उसका है
जो भी मन और वाणी से संभव है !! २। १४

जो कुछ भी जाना जाता है - ज्ञान

जिसको भी जाना जाता है - ज्ञेयम
जो यह सब जानने वाला है - ज्ञानी
यह तीनों वास्तविक नहीं हैं !
असल में गलती से जिसमें यह तीनों नज़र आते हैं
वो शुद्ध बोध मैं ही हूँ !! २।  १५

आश्चर्य है की दुःख का असली कारण

अपने को संसार से अलग समझना है
और इसका कोई हल नहीं !
यहाँ हर दिखाई देने वाली वस्तु अस्थाई है
एक मैं ही निर्मल बोध रूप सार हूँ !! २।१६

मैं केवल बोध होश रूप ही हूँ

अनजाने में मैंने अपने कई रूप बना लिए हैं !
इस बात को बार बार देख समझ लेने पर
अब मैं चुनाव-रहित हो गया हूँ !! २। १७

हैरानी बात है की मुझ में नज़र आने वाला

यह संसार वास्तव में मुझ में नहीं है !
न मेरा कोई बँधन है न ही कोई मोक्ष
यह दुविधा तब शाँत हुई जब
मैं सब तरफ से निराश बेआसरा हुआ !! २। १८

यह पक्का है कि संसार के साथ साथ

यह शरीर भी कुछ नहीं है !
केवल शुद्ध बोध रूप आत्मा ही है
अब उसमें किसकी कल्पना की जाए !! २। १९

यह शरीर स्वर्ग नरक बँधन मोक्ष और भय

सब कुछ कल्पनाएँ विचार मात्र  ही हैं !
मुझ चैतन्य बोध का इनमें क्या काम !! २। २०

आश्चर्य है कि मुझे लोगों की भीड़ में

भी कोई दूसरा नहीं नज़र आता !
सब जंगल की तरह एक जैसे नज़र आते हैं
ऐसे में कहाँ किस से मोह करूँ  !! २। २१

न मैं शरीर हूँ न यह शरीर मेरा है

और न ही मैं कोई जीव हूँ
मैं केवल बोध हूँ !
मेरा बँधन यही था जो मुझे
जिन्दा रहने की ईच्छा थी !! २। २२

हैरानी की बात है की

मुझ अनंत महासागर में मन रूपी
हवा के चलने पर बड़ी अजीब तरह की
कल्पनाओं विचारों जैसी लहरें उठती हैं
जो सागर की तरह मुझसे अलग नहीं हैं !! २। २३

मुझ अनंत आत्मा रूपी महासागर में

जब मन रूपी हवा समय अनुसार बंद हो जाती है
तब जीव रूपी व्यापारी का
संसार रूपी ज़हाज़ नष्ट हो जाता है !!

आश्चर्य है की मुझ अनंत महासागर में

जीव रूपी अनेक लहरें अपने स्वभाव से
उठती हैं आपस में टकराती हैं खेलती हैं
और फिर सागर में ही लीन हो जाती हैं !! २। २४


दूसरा अध्याय समाप्त 

प्रथम अध्याय


जनक की उत्सुकता और अष्टावक्र का आश्वासन

जनक पूछते हैं :
ज्ञान कैसे प्राप्त होता है
मेरी मुक्ति कैसे होगी
राग से छुटकारा कैसे मिलता है
प्रभु यह सब मुझे बताइये ! १। १


अष्टावक्र बताते हैं :

प्रिय यदि मुक्ति चाहते हो तो

सभी विषय विचारों की ज़हर की तरह उपेक्षा करो !

क्षमा सादगी दया संतोष और सच्चाई का
अमृत की तरह प्रयोग करो !! १। २


तुम न पृथ्वी हो न जल न अग्नि न हवा न आकाश हो

और न ही तुम इन सबसे बनी कोई वस्तु हो !

मुक्ति के लिए अपने को इन सबका साक्षी बोध रूप जानो !! १। ३


यदि तुम अपने शरीर को अलग जानकर

अपने अंदर शांत हो कर ठहर जाओगे

तो तुम अभी सुखी शांत और बंधन मुक्त हो जाओगे !! १। ४


न तुम ब्राहम्ण आदि किसी जाति के हो

न तुम गृहस्थ आदि आश्रम वाले हो

न तुम आँख आदि से दिखाई देने वाले हो !

तुम संग-रहित, आक़ार-रहित हो

तुम केवल संसार के साक्षी हो

इसलिए खुश रहो !! १। ५


सुख दुःख, धर्म अधर्म सब

मन के हैं , तुझ व्यापक के नहीं !

न तुम कर्म करने वाले हो

न तुम फल भोगने वाले हो

तुम सदा ही मुक्त हो !! १। ६


तुम एक ही सबकुछ देखने वाले हो

तुम सदा से मुक्त ही हो !

तुम्हारा बंधन यही है कि

तुम देखने वाले साक्षी को

कहीं और ढूंढते हो !! १। ७


तुम " मैं कर्ता हूँ " के अहंकार रूपी
भयंकर काले साँप से डसे हुए हो !

" मैं कर्ता नहीं हूँ " के विश्वास रूपी
अमृत को पीकर सुखी रहो !! १। ८


मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, बोध हूँ

इस निश्चय रूपी अग्नि से

अपने अज्ञान रूपी जंगल को जलाकर

शोक-रहित सुखी रहो !! १। ९


जिसमें या जिसको यह संसार

रस्सी में साँप जैसा नज़र आता है

वह आनंद परम-आनंद बोध तुम ही हो

इसलिए ख़ुशी से जियो !!१। १०


अपने को मुक्त समझने वाला मुक्त ही है

अपने को बंधा मानने वाला बंधा ही है !

यह कहावत सच ही है कि

जैसी किसी कि सोच हो

वैसी ही उसकी गति (अंत) होती है !! १। ११


आत्मा साक्षी है व्यापक है पूर्ण है

एक है मन से मुक्त है अकर्ता है कर्म-रहित है


संग-रहित है इच्छा-रहित है शान्त है

यह केवल भ्रम अज्ञानता के कारण

संसार के लोगों जैसी लगती है !! १। १२


अपने अंदर बाहर के भावों और

अपने अहंकार के भ्रम से मुक्त होकर

सदा स्थिर एक बोध रूप आत्मा को

हर जगह महसूस करो !! १। १३


बेटा,तुम इस शरीर रूपी बंधन से

बहुत देर से बंधे हुए हो !

"मैं बोध हूँ " इस ज्ञान रूपी तलवार से

उसे काटकर सुखी रहो !! १। १४


तुम संग-रहित हो कर्म-रहित हो दोष-रहित हो

तुम अपने आप से ही प्रकाशित हो !

तुम्हारा बंधन यही है कि तुम

समाधि के लिए कोशिश करते हो !! १। १५


यह संसार तुमसे ही व्याप्त है

संसार कि वास्तविकता तुम में ही पिरोई हुई है !

तुम शुद्ध हो तुम्हारा असली रूप बोध है

इसलिए तुच्छ मन के पीछे मत जाओ !! १। १६


तुम अपेक्षा-रहित हो उलझनों से परे हो

भार-रहित हो शीतलता के स्थान हो

अनंत बुद्धि और होश में रहने वाले हो

इसलिए परेशान न हो !! १। १७


हर रूप आकार वाली वस्तु को अस्थायी जानो

हर अरूप निर-आकार वस्तु को स्थायी जानो !

इतना समझ लेने से भी संसार में फिर मोह नहीं रहता !! १। १८


जैसे दर्पण में दिखने वाली तस्वीर

उसके अंदर भी और बाहर भी होती है

वैसे ही हमारे शरीर के अंदर और बाहर

दोनों में परम-आत्मा है !! १। १९


जैसे घड़े के अंदर और बाहर

एक ही आकाश सब जगह मौजूद है

वैसे ही सब जगह सदा रहने वाला परमात्मा

सभी लोगों में मौजूद है !! १। २०


पहला अध्याय समाप्त