जनक की उत्सुकता और अष्टावक्र का आश्वासन
जनक पूछते हैं :
ज्ञान कैसे प्राप्त होता है
मेरी मुक्ति कैसे होगी
राग से छुटकारा कैसे मिलता है
प्रभु यह सब मुझे बताइये ! १। १
अष्टावक्र बताते हैं :
प्रिय यदि मुक्ति चाहते हो तो
सभी विषय विचारों की ज़हर की तरह उपेक्षा करो !
क्षमा सादगी दया संतोष और सच्चाई का
अमृत की तरह प्रयोग करो !! १। २
तुम न पृथ्वी हो न जल न अग्नि न हवा न आकाश हो
और न ही तुम इन सबसे बनी कोई वस्तु हो !
मुक्ति के लिए अपने को इन सबका साक्षी बोध रूप जानो !! १। ३
यदि तुम अपने शरीर को अलग जानकर
अपने अंदर शांत हो कर ठहर जाओगे
तो तुम अभी सुखी शांत और बंधन मुक्त हो जाओगे !! १। ४
न तुम ब्राहम्ण आदि किसी जाति के हो
न तुम गृहस्थ आदि आश्रम वाले हो
न तुम आँख आदि से दिखाई देने वाले हो !
तुम संग-रहित, आक़ार-रहित हो
तुम केवल संसार के साक्षी हो
इसलिए खुश रहो !! १। ५
सुख दुःख, धर्म अधर्म सब
मन के हैं , तुझ व्यापक के नहीं !
न तुम कर्म करने वाले हो
न तुम फल भोगने वाले हो
तुम सदा ही मुक्त हो !! १। ६
तुम एक ही सबकुछ देखने वाले हो
तुम सदा से मुक्त ही हो !
तुम्हारा बंधन यही है कि
तुम देखने वाले साक्षी को
कहीं और ढूंढते हो !! १। ७
तुम " मैं कर्ता हूँ " के अहंकार रूपी
भयंकर काले साँप से डसे हुए हो !
" मैं कर्ता नहीं हूँ " के विश्वास रूपी
अमृत को पीकर सुखी रहो !! १। ८
मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, बोध हूँ
इस निश्चय रूपी अग्नि से
अपने अज्ञान रूपी जंगल को जलाकर
शोक-रहित सुखी रहो !! १। ९
जिसमें या जिसको यह संसार
रस्सी में साँप जैसा नज़र आता है
वह आनंद परम-आनंद बोध तुम ही हो
इसलिए ख़ुशी से जियो !!१। १०
अपने को मुक्त समझने वाला मुक्त ही है
अपने को बंधा मानने वाला बंधा ही है !
यह कहावत सच ही है कि
जैसी किसी कि सोच हो
वैसी ही उसकी गति (अंत) होती है !! १। ११
आत्मा साक्षी है व्यापक है पूर्ण है
एक है मन से मुक्त है अकर्ता है कर्म-रहित है
संग-रहित है इच्छा-रहित है शान्त है
यह केवल भ्रम अज्ञानता के कारण
संसार के लोगों जैसी लगती है !! १। १२
अपने अंदर बाहर के भावों और
अपने अहंकार के भ्रम से मुक्त होकर
सदा स्थिर एक बोध रूप आत्मा को
हर जगह महसूस करो !! १। १३
बेटा,तुम इस शरीर रूपी बंधन से
बहुत देर से बंधे हुए हो !
"मैं बोध हूँ " इस ज्ञान रूपी तलवार से
उसे काटकर सुखी रहो !! १। १४
तुम संग-रहित हो कर्म-रहित हो दोष-रहित हो
तुम अपने आप से ही प्रकाशित हो !
तुम्हारा बंधन यही है कि तुम
समाधि के लिए कोशिश करते हो !! १। १५
यह संसार तुमसे ही व्याप्त है
संसार कि वास्तविकता तुम में ही पिरोई हुई है !
तुम शुद्ध हो तुम्हारा असली रूप बोध है
इसलिए तुच्छ मन के पीछे मत जाओ !! १। १६
तुम अपेक्षा-रहित हो उलझनों से परे हो
भार-रहित हो शीतलता के स्थान हो
अनंत बुद्धि और होश में रहने वाले हो
इसलिए परेशान न हो !! १। १७
हर रूप आकार वाली वस्तु को अस्थायी जानो
हर अरूप निर-आकार वस्तु को स्थायी जानो !
इतना समझ लेने से भी संसार में फिर मोह नहीं रहता !! १। १८
जैसे दर्पण में दिखने वाली तस्वीर
उसके अंदर भी और बाहर भी होती है
वैसे ही हमारे शरीर के अंदर और बाहर
दोनों में परम-आत्मा है !! १। १९
जैसे घड़े के अंदर और बाहर
एक ही आकाश सब जगह मौजूद है
वैसे ही सब जगह सदा रहने वाला परमात्मा
सभी लोगों में मौजूद है !! १। २०
पहला अध्याय समाप्त
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