ऋषि अष्टावक्र की बात सुनकर राजा जनक कहने लगे :
हैरानी की बात है की
मैं निर्दोष हूँ , शांत हूँ, बोध हूँ
और प्रकृति से भी परे हूँ !
और प्रकृति से भी परे हूँ !
इतनी देर से मैं केवल मोह ममता
में ही ठगा गया हूँ !! २। १
जैसे मैं अपने शरीर को प्रकाशित करता हूँ
वैसे ही यह संसार मुझसे ही प्रकाशित होता है !
इसलिए सारा संसार मेरा है या
कुछ भी मेरा नहीं !! २। २
आश्चर्य है की इस शरीर सहित संसार को
अपने से अलग जानकर अभी ही कैसे मुझे
परमात्मा दिखाई दे रहे हैं !! २। ३
परमात्मा दिखाई दे रहे हैं !! २। ३
जैसे लहरें झाग बुलबुले
पानी से अलग नहीं हैं !
पानी से अलग नहीं हैं !
वैसे ही आत्मा से उत्पन यह संसार
आत्मा से अलग नहीं है !! २। ४
आत्मा से अलग नहीं है !! २। ४
जैसे गहराई से देखने पर हर कपड़ा
केवल धागों का जोड़ ही नज़र आता है
वैसे ही गहराई से देखने पर यह संसार
आत्मा का फैलाव ही नज़र आता है !! २। ५
जैसे गन्ने में महसूस होने वाली मिठास
उसमें समाए रस के कारण होती है !
उसमें समाए रस के कारण होती है !
वैसे ही मुझ में महसूस होने वाला संसार
मेरे ही कारण अस्तित्व में है !! २। ६
जैसे अँधेरे में रस्सी साँप लगती है
पर रौशनी में नहीं !
पर रौशनी में नहीं !
वैसे ही आत्मा को न जानने तक
संसार सच लगता है
संसार सच लगता है
पर आत्म ज्ञान होने पर नहीं !! २। ७
प्रकाश मेरा ही रूप है
मैं उससे अलग नहीं हूँ !
जब संसार प्रकाशित होता है
तो मेरे ही प्रकाश से होता है !! २। ८
हैरानी की बात है की
यह संसार मेरे अज्ञान की ही कल्पना है !
जैसे सीपी में चांदी, रस्सी में साँप और
रेत में पानी जैसे दिखने वाली सूर्य किरणें !! २। ९
मुझसे निकलने वाला यह संसार
मुझमें ही लीन हो जाता है !
जैसे मिटी का घड़ा मिटी में
पानी की लहरें पानी में और
सोने के गहने सोने में मिल जाते हैं !! २। १०
मैं हैरान हूँ
मेरे भीतर स्थित अविनाशी को नमस्कार है !
जो संसार में पत्ते से ब्रह्म तक नाश होने पर भी
मुझ में बैठा रहता है !! २। ११
मैं हैरान हूँ मुझको नमस्कार है
मैं एक शरीर वाला होकर भी
न कहीं जाता हूँ न कहीं आता हूँ
और सारा संसार मुझ में फैला हुआ है !! २। १२
मैं हैरान हूँ मुझे नमस्कार है
मेरे जैसा कुशल कोई नहीं
जो शरीर और संसार को बिना छुए
कब से इन्हें धारण किये हूँ !! २ १३
मैं हैरान हूँ मुझमें स्थित उसको नमस्कार है
जिसमें मेरा कुछ भी नहीं है या वो सब कुछ उसका है
जो भी मन और वाणी से संभव है !! २। १४
जो कुछ भी जाना जाता है - ज्ञान
जिसको भी जाना जाता है - ज्ञेयम
जो यह सब जानने वाला है - ज्ञानी
यह तीनों वास्तविक नहीं हैं !
असल में गलती से जिसमें यह तीनों नज़र आते हैं
वो शुद्ध बोध मैं ही हूँ !! २। १५
आश्चर्य है की दुःख का असली कारण
अपने को संसार से अलग समझना है
और इसका कोई हल नहीं !
यहाँ हर दिखाई देने वाली वस्तु अस्थाई है
एक मैं ही निर्मल बोध रूप सार हूँ !! २।१६
मैं केवल बोध होश रूप ही हूँ
अनजाने में मैंने अपने कई रूप बना लिए हैं !
इस बात को बार बार देख समझ लेने पर
अब मैं चुनाव-रहित हो गया हूँ !! २। १७
हैरानी बात है की मुझ में नज़र आने वाला
यह संसार वास्तव में मुझ में नहीं है !
न मेरा कोई बँधन है न ही कोई मोक्ष
यह दुविधा तब शाँत हुई जब
मैं सब तरफ से निराश बेआसरा हुआ !! २। १८
यह पक्का है कि संसार के साथ साथ
यह शरीर भी कुछ नहीं है !
केवल शुद्ध बोध रूप आत्मा ही है
अब उसमें किसकी कल्पना की जाए !! २। १९
यह शरीर स्वर्ग नरक बँधन मोक्ष और भय
सब कुछ कल्पनाएँ विचार मात्र ही हैं !
मुझ चैतन्य बोध का इनमें क्या काम !! २। २०
आश्चर्य है कि मुझे लोगों की भीड़ में
भी कोई दूसरा नहीं नज़र आता !
सब जंगल की तरह एक जैसे नज़र आते हैं
ऐसे में कहाँ किस से मोह करूँ !! २। २१
न मैं शरीर हूँ न यह शरीर मेरा है
और न ही मैं कोई जीव हूँ
मैं केवल बोध हूँ !
मेरा बँधन यही था जो मुझे
जिन्दा रहने की ईच्छा थी !! २। २२
हैरानी की बात है की
मुझ अनंत महासागर में मन रूपी
हवा के चलने पर बड़ी अजीब तरह की
कल्पनाओं विचारों जैसी लहरें उठती हैं
जो सागर की तरह मुझसे अलग नहीं हैं !! २। २३
मुझ अनंत आत्मा रूपी महासागर में
जब मन रूपी हवा समय अनुसार बंद हो जाती है
तब जीव रूपी व्यापारी का
संसार रूपी ज़हाज़ नष्ट हो जाता है !!
आश्चर्य है की मुझ अनंत महासागर में
जीव रूपी अनेक लहरें अपने स्वभाव से
उठती हैं आपस में टकराती हैं खेलती हैं
और फिर सागर में ही लीन हो जाती हैं !! २। २४
मुझसे निकलने वाला यह संसार
मुझमें ही लीन हो जाता है !
जैसे मिटी का घड़ा मिटी में
पानी की लहरें पानी में और
सोने के गहने सोने में मिल जाते हैं !! २। १०
मैं हैरान हूँ
मेरे भीतर स्थित अविनाशी को नमस्कार है !
जो संसार में पत्ते से ब्रह्म तक नाश होने पर भी
मुझ में बैठा रहता है !! २। ११
मैं हैरान हूँ मुझको नमस्कार है
मैं एक शरीर वाला होकर भी
न कहीं जाता हूँ न कहीं आता हूँ
और सारा संसार मुझ में फैला हुआ है !! २। १२
मैं हैरान हूँ मुझे नमस्कार है
मेरे जैसा कुशल कोई नहीं
जो शरीर और संसार को बिना छुए
कब से इन्हें धारण किये हूँ !! २ १३
मैं हैरान हूँ मुझमें स्थित उसको नमस्कार है
जिसमें मेरा कुछ भी नहीं है या वो सब कुछ उसका है
जो भी मन और वाणी से संभव है !! २। १४
जो कुछ भी जाना जाता है - ज्ञान
जिसको भी जाना जाता है - ज्ञेयम
जो यह सब जानने वाला है - ज्ञानी
यह तीनों वास्तविक नहीं हैं !
असल में गलती से जिसमें यह तीनों नज़र आते हैं
वो शुद्ध बोध मैं ही हूँ !! २। १५
आश्चर्य है की दुःख का असली कारण
अपने को संसार से अलग समझना है
और इसका कोई हल नहीं !
यहाँ हर दिखाई देने वाली वस्तु अस्थाई है
एक मैं ही निर्मल बोध रूप सार हूँ !! २।१६
मैं केवल बोध होश रूप ही हूँ
अनजाने में मैंने अपने कई रूप बना लिए हैं !
इस बात को बार बार देख समझ लेने पर
अब मैं चुनाव-रहित हो गया हूँ !! २। १७
हैरानी बात है की मुझ में नज़र आने वाला
यह संसार वास्तव में मुझ में नहीं है !
न मेरा कोई बँधन है न ही कोई मोक्ष
यह दुविधा तब शाँत हुई जब
मैं सब तरफ से निराश बेआसरा हुआ !! २। १८
यह पक्का है कि संसार के साथ साथ
यह शरीर भी कुछ नहीं है !
केवल शुद्ध बोध रूप आत्मा ही है
अब उसमें किसकी कल्पना की जाए !! २। १९
यह शरीर स्वर्ग नरक बँधन मोक्ष और भय
सब कुछ कल्पनाएँ विचार मात्र ही हैं !
मुझ चैतन्य बोध का इनमें क्या काम !! २। २०
आश्चर्य है कि मुझे लोगों की भीड़ में
भी कोई दूसरा नहीं नज़र आता !
सब जंगल की तरह एक जैसे नज़र आते हैं
ऐसे में कहाँ किस से मोह करूँ !! २। २१
न मैं शरीर हूँ न यह शरीर मेरा है
और न ही मैं कोई जीव हूँ
मैं केवल बोध हूँ !
मेरा बँधन यही था जो मुझे
जिन्दा रहने की ईच्छा थी !! २। २२
हैरानी की बात है की
मुझ अनंत महासागर में मन रूपी
हवा के चलने पर बड़ी अजीब तरह की
कल्पनाओं विचारों जैसी लहरें उठती हैं
जो सागर की तरह मुझसे अलग नहीं हैं !! २। २३
मुझ अनंत आत्मा रूपी महासागर में
जब मन रूपी हवा समय अनुसार बंद हो जाती है
तब जीव रूपी व्यापारी का
संसार रूपी ज़हाज़ नष्ट हो जाता है !!
आश्चर्य है की मुझ अनंत महासागर में
जीव रूपी अनेक लहरें अपने स्वभाव से
उठती हैं आपस में टकराती हैं खेलती हैं
और फिर सागर में ही लीन हो जाती हैं !! २। २४
दूसरा अध्याय समाप्त
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